रहना नहीं देस बिराना है
रहना नहीं देस बिराना है।
रहना नहीं देस बिराना है ॥
संसार यह कागद की पुड़िया,
बूँद पड़े घुल जाना है ॥
संसार यह काँटे की बाड़ी,
उलझ-उलझ मर जाना है ॥
संसार यह झाड़ और झाखड़,
आग लगे जल जाना है ॥
कहें कबीर सुनों भाई साधो,
सतगुरु ज्ञान ठिकाना है ॥
~ कबीर साहब
“रहना नहीं देस बिराना है।
रहना नहीं देस बिराना है ॥”
यह स्थान अपना नहीं है,
यह देश पराया है — यहाँ टिकना नहीं।
आध्यात्मिक अर्थ:
यह संसार गलत नहीं,
पर स्थायी समझ लेना ही भूल है।
समस्या जगह नहीं,
पहचान की जिद है।
“संसार यह कागद की पुड़िया,
बूँद पड़े घुल जाना है ॥”
यह संसार काग़ज़ की पोटली जैसा है,
एक बूँद पड़ी और सब घुल गया।
आध्यात्मिक अर्थ:
यहाँ न वस्तुएँ झूठी हैं,
न जीवन।
झूठा है —
उनसे सुरक्षा और स्थायित्व माँगना।
थोड़ा सा सच पड़ते ही
अहंकार की रचना गल जाती है।
“संसार यह काँटे की बाड़ी,
उलझ-उलझ मर जाना है ॥”
यह संसार काँटों की बाड़ जैसा है,
उलझते जाओ, घायल होते जाओ।
आध्यात्मिक अर्थ:
काँटे बाहर नहीं हैं —
अपेक्षाएँ काँटे हैं।
जितना पकड़ोगे,
उतना उलझोगे।
समस्या संसार नहीं,
पकड़ है।
“संसार यह झाड़ और झाखड़,
आग लगे जल जाना है ॥”
यह संसार सूखी झाड़ियों जैसा है,
आग लगे तो सब जल जाता है।
आध्यात्मिक अर्थ:
आग विपत्ति की नहीं,
जागरण की है।
जो पहचान सूखी है,
वह सत्य के स्पर्श से जलती ही है।
जो जल जाए, वही झूठ था।
“कहें कबीर सुनों भाई साधो,
सतगुरु ज्ञान ठिकाना है ॥”
कबीर कहते हैं — साधुओ, सुनो,
सतगुरु का ज्ञान ही ठिकाना है।
आध्यात्मिक अर्थ:
ठिकाना कोई स्थान नहीं।
ठिकाना है —
जहाँ “मैं” टिकता है।
गुरु बाहर नहीं ले जाते,
भीतर सही जगह बिठा देते हैं।
सार
यह भजन संसार को छोड़ने की बात नहीं करता।
यह संसार पर टिक जाने की भूल को तोड़ता है।
यह कहता है —
यहाँ खेलना है,
बस बसना नहीं है।
जब यह समझ आ जाती है,
तो न डर रहता है,
न उलझन,
न शिकायत।
तब यह “बिराना देस” भी
घर जैसा हल्का हो जाता है।